जान कर भी उसको
जाने दिया तुम ने,
'आशना' जुदाई को
भड़ावा दिया तुमने ।
दिल नहीं लगता
तो कुछ और बात थी,
मजबूरियों के नाम पर
दग़ा किया तुम ने ।
उसकी ओक से गिरती
या घूंट बन जाती,
मुझे औरत, उसे जाम-ए-इश्क़
खुदा यह क्यूँ किया तुम ने ।
रुसवाई ने हिसाब में
पक्का कर दिया हमें ,
कुछ महीनों का ब्याज़
चुकता नहीं किया तुम ने ।
हम्नशीं, आज भी
पूछते हैं यह सभी,
उसको ना ग्वार
ऐसा क्या किया तुम ने ।
जिंदगी की मेहफिल में
आना जाना चलता है,
नहीं आकर 'आशना'
अच्छा किया तुम ने ।।
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UNTIL WE MEET NEXT

