फुरसत लिए आज काम से
जरा खुद सवरने बैठी हूॅं ।
जिंदगी गुज़ारने के बाद
मैं अब निखरने बैठी हूॅं ।
यह दर्द है जो छूटा है
मेरी लिखाई में कोई ।
आॅंसू भी ना छुप पा रहे
इन पलकों कि आगोश में ।
है चांंद भी कुछ जल रहा
युॅं आज मुझको देख कर ।
पन्नों में अब उतारूॅं मैं
शब्द कुछ समेट कर ।
आईना है जिंदगी
रोशनी सी उतरु मैं ।
रोके ना मुझे अंधेरा
चाॅंदनी सी चमकू मैं ।
दुनिया के इस बाज़ार में
पाया कभी खोया कभी ।
जो हार के हारा नहीं
बस चैन से सोया वही ।
हर द्वार पे जीत तक
अनेकों पहरेदार हैं ।
मैं जाती हूॅं इधर से एक
उधर से आते चार हैं ।
छुपाऊॅं मैं तुझसे क्या
जीवन तेरा ही नाम है ।
कर्ज दूॅं तेरा उतार
जिम्मेदारी ना भार है ।
मृत्यु से क्यों भय मुझे
आखिर मुसाफिर नाम है ।
लौटना है मुझको भी
सफर वहीं विराम है ।।
THANK YOU FOR YOUR TIME
UNTIL WE MEET NEXT


