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तपिश नई हाॅं 'आशना '

हर रोज़ थी तुम्हें इक कहीं।

कहॉं गई वो बिजलिय़ा

किधर गुमी वो रौशनी ।


क्या सोचती हो मुक युहीं

करो ज़रा कुछ टिप्पणी ।

विचार दो , उंगली उठाओ

राह पे क्या तुम सही ..?


फुऱकत में मंज़िलें

सब समक्ष हैं तुम्हारे ।

गुज़रे हैं रास्ते

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