तपिश नई हाॅं 'आशना '

हर रोज़ थी तुम्हें इक कहीं।

कहॉं गई वो बिजलिय़ा

किधर गुमी वो रौशनी ।


क्या सोचती हो मुक युहीं

करो ज़रा कुछ टिप्पणी ।

विचार दो , उंगली उठाओ

राह पे क्या तुम सही ..?


फुऱकत में मंज़िलें

सब समक्ष हैं तुम्हारे ।

गुज़रे हैं रास्ते

या तुम कहीं गुज़र गई ।


जिंदा क्या है तुम में अब ..?

हॉं ,श्वास बाकी है बची ।

बस करो , जाने भी दो

अब जिस्म़ काम का नहीं ।


मिल जियेगें किसी दौर में

ऐ 'आशना ' हम फिर कभी

चलो उठो , चलें अभी

वो दूर, बदली पुकारती ।।


THANK YOU FOR YOUR TIME

UNTIL WE MEET NEXT