नफ़रतों का सबब

कुछ इस कदर बढ़ गया ,

इंसान नियत को छोड़

पराए मज़हब से डर गया ।


यह सुरख शिकायतें

वज़ह के रुख छोड़ गई ,

महज़ रिवाजों के दम भर

कई लोगों को झंझोर गई ।


ऐकता के शहर की

बस्तियाॅं उजाड़ गया ,

वो ड़कैत नास्तिक

मज़हब से मार गया ।


जलते फिरे अफसानें

दुशमनी की आँचों में ,

दोस्ती कि चिता जली

वहाॅं, इश्क की गलियारों में ।


सहम छुपा सूरज चंदा

घटाओं कि आगोश ओढ़ ,

तैयारियां जाने कि हुई

निशाचरी दुनिया को छोड़ ।


बुत के बंदे लड़ रहे

एक खुदा के पीछे ,

कानून हमारा अंधा ठहरा

कोई क्या उम्मीदें सींचे ।।


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