झोंके मुझको क्यूॅं
लगे हैं बोलते ,
ज़बान इनको आ गई
क्या आज है ।
पल भर लिपटकर
दूर मुझसे जा रहे ,
चिल्ला रहे क्यूॅं
दरिया के उस पार हैं ।
अज्ञानता मेरी का
ज्ञान हो गया ,
लो, वक्त तुमसे
बिछड़ने का हो गया ।
मुड़ जा रही इस
मोड़ से अब फिर कहीं ,
अब आना तुम मेरे
कहीं पीछे नहीं ।
बस करो कोशिश
काॅंच को ना जाम दो ,
टूटे हुए टुकड़े
पैमाना नहीं ।
ज़बां मेरी नहीं
हक में मेरे ,
अपनी आप आबलों
से थाम लो ।
सन्नाटों को भी
सुनने बैठो कभी ,
फ़सादी लफज़ों पे
ना ध्यान दो ।।
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UNTIL WE MEET NEXT


