मृगतृष्णा सी, हमारी कहानी रहीं
जो देखें थे स्वप्न,वो पूरी ना हुई
मिलन के प्यास में हम भटकते रहे,
मैं भी प्यासा रहा तू भी प्यासी रहीं
ये दुनियां हमें बस घुमाती रहीं
दायरे ना जाने कितने बताती रहीं
अब ना आना इसके माया जाल में
जब भी देखो ये फायदा उठाती रहीं
मंच से तुमको अब गुनगुनाता हूँ मैं
तुझको हर अक्षरों से सँवारता हूँ मैं
नज़र ना लगे तुझको इस दुनियाँ की
मैं काले स्याही से पन्नों पर उतारता तुम्हें
माँ बाबा का ख्याल मैं करती रहीं
इस ज़माने से हर दफ़ा डरती रहीं
जब भी आए तेरे याद से हिचकियाँ,
अश्रु पीकर मैं हिचकियाँ मिटाती रहीं
-शुभम् तिवारी


