हमारी खैर क्या होगी? वो हमसे गैर क्या होगी? कहाँ जाएगी दुनिया में? क्या ही पाएगी दुनिया में? उसे है लौट कर आना, हमें है फिर उसे पाना, हमें फिर से वो चाहेगी, हमें हमसे निभाएगी, हमें भी इल्म है उसका, उसे हमारी भी खबर है! हमें भी नींद न आती, न सोती उसकी नज़र है! हैं ज़रा हम भी बेकरार, वो करती होगी इंतेज़ार, है हमको इतना एतबार, कि हमें देर क्या होगी? वो हमसे गैर क्या होगी? थे हम भी थोड़े दगाबाज़, थी वो भी थोड़ी सी नाराज़, न आया उसको कभी नाज़, न आये हम भी कभी बाज़, यूँही चलता रहा आलम, यूँही कटती रही रातें, कभी खामोश हुए हम, कभी कुछ कम रही बातें, मगर अब रह नही सकते, कुछ उससे कह नहीं सकते, तकलीफें सह नहीं सकते, वहाँ नाशाद है वो भी! यहाँ बर्बाद हैं हम भी! उसे भूले नहीं हैं हम, उसे याद हैं हम भी, क्या पूछूँगे उससे हम? भला सवाल क्या होगा? हमें यूँ सामने देखेगी, उसका हाल क्या होगा? क्या सोचेंगे उसको देख? उसका खयाल क्या होगा? कहेंगे उसके कानों में, फ़सानों में, बहानों में, के सारे आसमानों में, हमने उसे तलाशा है, न कोई होगा उस जैसा, खुदा ने यूँ तराशा है! मिल जाएगी वो हमको, हमे फिर आस क्या होगी? हमारी साँसों में गुज़रेगी, वो इससे पास क्या होगी? कभी एक चाय की प्याली, में दुनिया घोल जाएगी, कई बादल भी बरसेंगे, जो ज़ुल्फ़ें खोल जाएगी, दुनिया उसके बगैर क्या होगी? वो हमसे गैर क्या होगी?