तू बरखा मैं बंजर ज़मीन हूं
तेरे बिना मैं भी कहां हसीन हूं
रख़ देती है जबीन मेरे होंठों पे
आख़िर मैं भी उसका यक़ीन हूं
तुम समझती हो जितना सीधा
लेकिन मैं बहुत ही बड़ा कमीन हूं


तू बरखा मैं बंजर ज़मीन हूं
तेरे बिना मैं भी कहां हसीन हूं
रख़ देती है जबीन मेरे होंठों पे
आख़िर मैं भी उसका यक़ीन हूं
तुम समझती हो जितना सीधा
लेकिन मैं बहुत ही बड़ा कमीन हूं