पढ़ पढ़ कर कट रही हैं राते हमारी,
नौकरी ना मिली तो भैया कैसे चलेगी जिंदगी हमारी।
शिक्षा व्यवस्था बदला, नेता बदले, तकनीक ने खूब उछाल मारी,
फिर भैया दिन प्रतिदिन क्यों बढ़ रही इतनी बेरोजगारी।
निकम्मे हम है या सरकार समझ नहीं आता,
अब तो जैसे तैसे चल रही है जिंदगी की गाड़ी।
आती है नियुक्तियां, पर आरक्षण, अनुकम्पा और पैसो पे लुट जाती है सीटें सारी,
दूसरो के मिठाई खा खा कर थक चुका, कब आएगी दूसरो को मिठाई खिलाने की हमारी बारी। पढ़ पढ़ कर कट रही है राते हमारी,
कोई तो बता दे कब खत्म होगी देश से बेरोजगारी।

