खुद के जिस्मानी-रूहानी मिज़ाज से वाकिफ़ हुए थे तुझसे इश्क़ कर के, ग़नीमत हैं।

जिस्म के जर्रे-जर्रे की खुशबू के बिना पर कैद-ए-बा-मशक्कत मिली।।


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