मैं जी भर जियूँ, इसमें हर्ज़ क्या है?
मेरा ज़िन्दगी पर कर्ज क्या है?
मैं दौर-ए-ज़माने के कायदे चुनता हूँ
पर पहले अपने ज़मीर की सुनता हूँ
तुम खोज ना सके मेरी बातों का मर्म क्या है
फिर किस हक़ से पूछते हो, मेरा धर्म क्या है?
मैनें अपनी उम्मीदें उबाल पे रख दीं
अपनी उपेक्षा बेफिक्री की हवा में उछाल कर रख दी
मैं भूल गया मेरी सीमा का चरम क्या है
और आपने मरहम लगाकर पूछा भी नहीं मेरा ज़ख्म क्या है?
अब तो साऐ भी उनके रूप से अलग दिखते हैं
झूंठों के काफिले सत्य की खोज में निकलते हैं
चकाचौंध में पूछते हैं वो भरम क्या है?
जिनकी नियत नहीं उनका ज़बानी हरफ़ क्या है?
वो दकियानूसी को पलकों पे बिछा कर रखते हैं
हम बदलाव की हवा पर सवार निकलते हैं
जो तर्क के सांचे में ढलती नहीं वो रस्म क्या है?
पैरों में बंधी बेड़ियों को तोड़ने में शर्म क्या है?
जब माँ नही होती, ये घर अच्छा नहीं लगता
खाली घोसलों का ये शजर अच्छा नहीं लगता
जो प्रसव की पीड़ा से गुजरा हो, उसके लिए कुछ रातें सर्द क्या है?
जो स्त्री की आगे झुक सकता नहीं, वो मर्द क्या है?
वो आवाज़ हैं, जिसे तलाश हलक की है
वो तारें हैं, जिन्हें चाहत फलक की है
जिसे तोड़ के ना निकले, वो हद क्या है
चाँद को क्या खबर ज़मीनी गर्द क्या है
मैं जी भर जियूँ, इसमें हर्ज़ क्या है?
मेरा ज़िन्दगी पर कर्ज क्या है?
