तुम एक शीर्षक खोज़ रही थी 

अपनी कहानी के लिए......

आँखें धीमी मूंद कर।

और सहसा......

महसूस करती हो

अपने प्रेमी के अधरों को…...

अपने होठों पर नहीं 

बल्कि माथे की शिकन पर.....

क्या अब भी तुम किसी शीर्षक की खोज में हो?

प्रेम से बेहतर.....



श्रुतिका साह