कि मैं रूबरू नहीं हूं तुम्हारे उस जहान की रिवायतों से,

बेशक, मैं काफी दूर हूं उस पाक साफ मोहब्बत की कवायदों से,

फिर भी क्या मैं मोहब्बत के लायक हूं?

.......... कि मैं एक तवायफ हूं!

कि जहां इश्क का सरेआम इजहार हो,

किरदारों की दमक को जानने में ना इज़्तिरार हो,

क्या मैं ऐसी मोहब्बत के लायक हूं?

...... कि मैं एक तवायफ हूं!

कि कोई अब मेरा भी मुन्तजिर हो,

अर्सो से खामोश इन लबों पर हर अल्फ़ाज़ के बाद एक हर्फ फिर हो,

क्या मैं ऐसी मोहब्बत के लायक हूं?

...... कि मैं एक तवायफ हूं!

कि जहां मेरी पाकीज़गी पर कोई कसक बाकी ना रह जाए,

कि जहां किसी की नज़र को मेरा नज़राना मिल जाना सिर्फ इत्तफाकी ना रह जाए,

और वहां उस जगह, उस वक़्त क्या मैं उस मोहब्बत के लायक हूं?

....... कि मैं एक तवायफ हूं!!



श्रुतिका