उनकी राहों में भटका मज़लूम बशर हूँ मैं
बेकिनारे समंदर की सफीनों सा हशर हूँ मैं
वो आजिज़ हैं मुझसे तो ग़म क्यों हो
गर्दिशों में पला नुक्ता-ए-नज़र हूँ मैं
जहाँ में मुहब्बत है, मुझे क्यों नसीब नहीं
आरज़ू-ए- रंगे-बहारा पतझड़ का शज़र हूँ मैं
उनका मुझसे वाबस्ता ना होना भी जायज़ है
उनकी दास्ताने-जीस्त का वाक़या मुख़्तसर हूँ मैं
मेरी परेशानियों से वो पशेमां हों तो कैसे
ना तंज हूँ, ना रंज हूँ, जज़्बात बेअसर हूँ मैं