कभी ख्याले-ज़ुहद तो कभी हसरतें तमाम हूँ मैं तेरे होठों की लरज़ से निकला हरेक क़लाम हूँ मैं तू साथ तो महफ़ूज, ना हो तो बिखरा ज़ाम हूँ मैं तेरी मौज़ूदगी पर मौक़ूफ़ बेबस एहतिराम हूँ मैं तेरे जज़्बातों की मुन्तज़िर ख़ूबसूरत मुक़ाम हूँ मैं तेरी वुस्अते इश्क़ का आख़िरी अंजाम हूँ मैं होने को हमा हूँ और ना होने को बेनाम हूँ मैं तेरी राहों में ढलती एक तन्हा शाम हूँ मैं