जाने तेरा ख़त जायेगा किस रस्ता मुझमे मेरे जैसा अब कोई नहीं बसता
तू रातों को चराग़ लिए ढूंढे है जिसको वो तेरे दर पे दम तोड़ गया आहिस्ता
महृ-ख्वाब आँखों को आफताब क्या हो मेरी शबों से अब तन्वीरें नहीं वाबस्ता
मुफ़लिसी में गए वो जज्बातों को बेचने बेच आये वो अपना इश्क़ सबसे सस्ता
पसे-गुनाह वजह मांग रहा था जो हमसे दास्ताँ हमारी सुन रो दिया फ़रिश्ता


