हो अजनबीयत बेवफाई की जुबाँ जैसे हर दफा मिले हम पहली मर्तबा जैसे

माज़ी से चुराया कुछ पलकों में छुपाकर बना वो मुस्तक़बिल का तज़ुर्बा जैसे

अश्क बहा आये जिन एहसासों की क़ब्र पे वो अब भी छू जाते हैं बादे-सबा जैसे

हम आगे चल दिएे,पर वो पीछे ना छूटे हम परिन्दे हों और वो बायबाँ जैसे

एक ग़फ़लत ज़रा इस दिल से क्या हुई हर ग़म हम पे हो गया मेहरबाँ जैसे