चुप रहकर आपबीती बता रहा है कोई खामोशियों से अपनी सता रहा है कोई

गुनहगार बेवफाई न हो तो गिला किससे हो अपने मुकद्दर पे अफ़सोस जता रहा है कोई

जो डूब जाए दरिया में तो ख़ैरियत ही हो सफीनों में ज़िन्दगी बस बिता रहा है कोई

रहे ना हसरत कोई दिल में फिर बाकी बिखरे ख़्वाबों को आईना दिखा रहा है कोई

वजूद ही ना हो उसकी दास्तां-ए-इश्क का एक कहानी लिख के मिटा रहा है कोई

गोया किसी को याद करना मुनासिब नहीं किसी को भूल के मुहब्बत निभा रहा है कोई

ना अश्क,ना तबस्सुम,ना फ़िक्र, ना ज़िक्र किस क़दर खुद से दूर जा रहा है कोई