प्रेम ~संजय कवि 'श्रीश्री'


प्रेम में लीन होना,

प्रेम को अंगीकार करना;

तुम निर्भय होकर

नश्वरता स्वीकार करना।


ये प्रेम ही तो है,

जिसे तुम करने आये हो;

मही पे

घृणा पाप क्लेश को हरने आये हो।


प्रेम करो, बस प्रेम,

कभी तुम मर नहीं सकते;

शोक की अनुभूति

कभी तुम कर नहीं सकते।


~संजय कवि 'श्रीश्री'

(सर्वाधिकार सुरक्षित)

#विश्व कविता दिवस