वो मैं ही हूँ ~संजय कवि 'श्रीश्री'


मगन मुदित जिसका कर थामा,

मंगलप्रद, वो मैं ही हूँ;

बंद नेत्र हो दर्शन जिसका,

प्राणप्रिये, वो मैं ही हूँ।

विलग हो जिससे, कमी प्रेम की,

तुमको खली, वो मैं ही हूँ;

पाने जिसको पावक पथ पे,

जल के चली, वो मैं ही हूँ।

जिस मोहपाश में उलझ गयी तुम,

आकर्षण, वो मैं ही हूँ;

जिसका है तुमने वरण किया,

पुरुष सुदर्शन, मैं ही हूँ।

क्रोध कोई हो मन में प्रिये,

तुम अतीत का भान करो;

उस अतीत में जीवन दर्शन,

पूर्ण समर्पण, मैं ही हूँ।

कटुता लघुता फिसलन वाणी की,

मन से तुम विस्मृत कर दो;

आलिंगन अभिनन्दन कर लो,

जीवन में अमृत भर दो।

है सत्य सखे! मुझ में हो तुम,

और तुम में भी मैं ही हूँ;

स्वयं से साक्षत्कार करो,

देखो समक्ष, वो मैं ही हूँ।

~संजय कवि "श्रीश्री"

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