स्वयं को न छलो आराध्य ~संजय कवि 'श्रीश्री'


मेरे आराध्य!

परित्याग से पहले

मुझे कह सकते थे,

या सह सकते थे;

लोगों की झूठ फैलाई

मेरी कलंक कथा,

या पूछ सकते थे मुझसे मेरी व्यथा;

किन्तु ये स्वांग रचाना,

एक ओजहीन अहं को बचाना;

शोभा नहीं देता।

जब गूँज करेगा

निश्छल वात्सल्य मेरा,

होगा शिथिल सवेरा;

हृद में उठती हूक को

निःशब्द बने मूक

रोकोगे कैसे,

अविरल अश्रुधारा को टोकोगे कैसे;

कैसे कह सकोगे

समाज के दबाव में,

ओजहीन अहं के प्रभाव में;

अभी भी

तुम मुझे त्याग नहीं सके,

स्नेहिल पुकार से भाग नहीं सके;

स्वयं को न छलो आराध्य!


~संजय कवि 'श्रीश्री'

 (सर्वाधिकार सुरक्षित)