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सम्मुख तुम्हारे सखी ~संजय कवि 'श्रीश्री'


सम्मुख तुम्हारे सखी ~संजय कवि 'श्रीश्री'

नेत्र देखते हैं अपलकजागते, सो जाता हूँ।स्वयं में रहता नहीं,कुछ और हो जाता हूँ।रम्यता पर मुग्ध होतुममें ही खो जाता हूँ।सम्मुख तुम्हारे सखी,असहाय हो जाता हूँ।

— संजय कवि 'श्रीश्री'
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