शकुनि को जीवन से निकाल दीजिये ~संजय कवि 'श्रीश्री'
शकुनि को
जीवन से निकाल दीजिये।
सुविधा देख
स्वयं गढ़ेगा
धर्म के नए मापदंड,
षडयंत्र का पर्याय
ये शकुनि
जब सलाहकार होगा,
अरि का प्रचंड वार होगा;
पराजय से पहले
स्वयं को सँभाल लीजिये;
शकुनि को
जीवन से निकाल दीजिये।
विस्मरण न हो
महाभारत का,
जाने कितने
रथी,
महारथी;
घोर धनुर्धर,
वीर गदाधर;
अपयश मस्तक मढ़े,
इसकी भेंट चढ़े;
ऐसा महाविष है
ये शकुनि;
चेतिये,
विष न पीजिये;
शकुनि को
जीवन से निकाल दीजिये।
आवश्यक नहीं मामा हो,
हो सकता है
मित्र सम्बन्धी सहोदर या भ्राता हो;
किन्तु शकुनि है,
हर युग में होता है
क्योंकि शकुनि अमर है,
आप इसे मार नहीं सकते;
आड़ लिए मर्यादा का
कुटिल स्वांग करता है,
स्वजनों के सुख चैन हरता है;
ये शकुनि;
इसका त्याग कीजिये,
शकुनि को
जीवन से निकाल दीजिये;
शकुनि को
जीवन से निकाल दीजिये।
~संजय कवि 'श्रीश्री'
(सर्वाधिकार सुरक्षित)


