निःसंदेह पवित्र हो, तुम मेरे मित्र हो ~संजय कवि 'श्रीश्री'


मेरा जो चरित्र है,

तुम उसी के चित्र हो;

निःसंदेह पवित्र हो,

तुम मेरे मित्र हो।


तुम्हीं हो शक्ति-साधना,

विश्वास की उपासना;

जीवन की सुगंध हो,

श्रेष्ठतम तुम इत्र हो;

निःसंदेह पवित्र हो,

तुम मेरे मित्र हो।


दर्शन हो मानों पर्व हो,

तुम्हीं तो मेरे गर्व हो;

हस्त मिले ही रहेंगे,

चाहे पथ विचित्र हो;

निःसंदेह पवित्र हो,

तुम मेरे मित्र हो।


~संजय कवि 'श्रीश्री'

(सर्वाधिकार सुरक्षित)