निःसंदेह अजेय हो तुम ~संजय कवि 'श्रीश्री'
(पूज्य अग्रज को समर्पित)
निःसंदेह अजेय हो तुम।
दुर्भाग्य को
ललकार के,
उत्क्रांति को
आकार दे;
तुम्हारी ये विजय।
निःसंदेह अजेय हो तुम।
आभार
जन्मदाता को
जिन बदौलत तुम बड़े हुए,
उन उंगलियों को
जिन्हें थाम तुम खड़े हुए;
यहाँ तक लाने वाली
सीढ़ियां,
तुम्हारे लिए खप गई
पीढ़ियां;
सभी धन्य हुईं।
निःसंदेह अजेय हो तुम।
~संजय कवि 'श्रीश्री'


