मेरे प्रेम का तिरस्कार, मुझे सहर्ष है स्वीकार ~संजय कवि "श्रीश्री"
मेरे प्रेम का
तिरस्कार,
मुझे
सहर्ष है स्वीकार।
मुक्त कर दो
मोह से अपने,
टूट जाने दो
कुछ सपने।
बनने दो
मुझे साधक तुम,
मत बनो
बाधक तुम।
जाना है
मुझे लक्ष्य तक,
अमिट
अटल सत्य तक।
होने दो
कर्म-बोध अंगीकार,
वही तो है
जीवन का आधार।
मेरे प्रेम का
तिरस्कार,
मुझे
सहर्ष है स्वीकार।
~संजय कवि "श्रीश्री"
(सर्वाधिकार सुरक्षित)


