मैं तुम्हारा हृदय, तुम मेरे स्पंदन कहलाओगे ~संजय कवि 'श्रीश्री'


हृदय

बोल रहा था

करुण क्रंदन से;

डूबते

मद्धिम पड़ते

स्पंदन से।

तुम मेरे ही

आश्रय में रहते हो;

कंपित होते प्रतिपल

अनवरत चलते हो।

आदि से

मेरे लिए,

तुम चल रहे हो;

पुलकित हो

इतनें से,

मुझमें पल रहे हो।

किन्तु मित्र!

आज भाग्य हमें

छल रहा है;

कदाचित

काल अंतिम

चल रहा है।

धीरे धीरे

कंपन तुम्हारे थम जायेंगे;

रक्त मेरे

शिराओं में जम जायेंगे।

तुम स्थिर हो जाओगे,

मैं भी नहीं रहूँगा शेष;

किन्तु एक सत्य,

रहेगा विशेष।

मेरी हर बात में,

तुम,

याद किये जाओगे;

सदैव

मैं तुम्हारा हृदय,

तुम

मेरे स्पंदन कहलाओगे।

मेरे स्पंदन कहलाओगे।


~संजय कवि 'श्रीश्री'

(सर्वाधिकार सुरक्षित)