इतना ही तुमसे कहना है ~संजय कवि "श्रीश्री"


सेवा, शीश, प्रेम का भाव,

जिन चरणों को अर्पित है;

दीनदयाल उन्ही अग्रज से

सेवक आज तिरस्कृत है।

कटुता लघुता का ज्ञान नहीं,

फिसलन वाणी में हुई नहीं;

मन व्यथित, अचंभित, ठगा ठगा,

करता है बारम्बार प्रश्न?

मैं नीर हीन मीन भांति निरुत्तर,

तुम उत्तर दे दो स्वामी;

मेरा क्यों तुमने त्याग किया,

हूँ अनुज तुम्हारा अनुगामी।

ये मिथ्या की कैसी छाया,

जिसने है तुमको भरमाया;

कुछ तो बोलो, भेद खोलो,

मैं द्वार खड़ा हूं, मुरझाया।

हे निर्मल हृदय श्याम काया,

दुष्कर, वियोग अब सहना है;

तुम बिन मसान मैं, नाथ मेरे,

इतना ही तुमसे कहना है।

सेवा, शीश, प्रेम का भाव,

जिन चरणों को अर्पित है;

दीनदयाल उन्ही अग्रज से

सेवक आज तिरस्कृत है।

~संजय कवि "श्रीश्री"

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