हे मनुष्य! विध्वंस के स्वामी रुक जाओ ~संजय कवि 'श्रीश्री'


हे मनुष्य!

विध्वंस के स्वामी

रुक जाओ,

करबद्ध सदा

सम्मुख प्रकृति के

झुक जाओ।

मत छेड़ो

पर्वत पत्थर

सरिता के जल की धारा को,

उत्कंठा

अब थाम चलो

न्योतो ना भू-अंगारा को।

ये छूछा अभिमान

तुम्हारा

मंद करो,

वृक्षों का वध कर

राह बनाना

बंद करो।

हे मनुष्य!

विध्वंस के स्वामी

रुक जाओ।

~संजय कवि 'श्रीश्री'

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