हम कितने गलत थे ~संजय कवि 'श्रीश्री'
खालीपन
जीवन का
मन का
धन का
भरते भरते,
सब खो गया,
चित्र भी
चरित्र भी
मित्र भी;
अब
निर्बल
दुर्बल
एकाकी हो,
स्वयं से निरुत्तर,
शून्य में
भविष्य निहारते,
यही सोचते हैं
हम कितने गलत थे।
~संजय कवि 'श्रीश्री'
(सर्वाधिकार सुरक्षित)


