अमावस्या की निशा ~संजय कवि 'श्रीश्री'


अमावस्या की निशा,

निःशब्द उदास

कितनी अधूरी।

जैसे जैसे चाँद

मिटता गया,

काल के ग्रास में

सिमटता गया।

विवश हो बेचारी

ये रोती रही,

स्वर्णिम प्रभा

अपनी खोती रही।

दुःखो के कालिमा में

सिमट जो गई,

कुंठित तो थी

फिर कलंकित हुई।

'डरावनी है ये'

ऐसी अंकित हुई।

दुःख असह्य थे,

जिह्वा ने साथ न दिया;

यात्रा अकेले की थी,

किसी ने हाथ न दिया।

निःशब्द कह न सकी,

निःशब्द कह न सकी,

सुनो! मैं डरावनी नहीं हूँ;

बस मेरा चाँद नहीं रहा,

सो लुभावनी नहीं हूँ।

अमावस्या की निशा,

निःशब्द उदास

कितनी अधूरी।

कितनी अधूरी।


~संजय कवि 'श्रीश्री'

(सर्वाधिकार सुरक्षित)