जिंदगी कि उस मझधार में फसा हुं,समक्ष नहीं आ रहा है कि,यादें बनाऊ?या फिर यादों में जिऊं?
जिंदगी कि उस मझधार में फसा हुं,समक्ष नहीं आ रहा है कि,
यादें बनाऊ?या फिर यादों में जिऊं?