मनः स्थिति
इंतज़ार की इन्तहा हुई..
और मिलने को तरस गये!
कुछ दिनों की दूरी नही..
लगता है बरस निकल गये !!
बैठकर साथ जो बाते करनी है..
वो सोचते सोचते थक गये!
कभी कभी जो हंस कर कहा..
आज उसी माहौल में फस गये !!
फिर कभी समय मिलेगा जब बतायेंगे..
तुम बिन दिन कैसे गये!
याद किया हर बात में तुमको..
हंसी हंसी में आँसू निकलते गये !!
कभी न खत्म होने वाली बातें..
आज मन में दबाते गये!
तुम तक हर वो बात पहुंच जाये..
जिसे दिल ही दिल में दोहराते गये !!
कभी मिल न सके तो कैसे कहेंगे..
इस सोच से घबरा से गये !
मिटा देंगे इस बार हर गिला शिकवा..
ये वादा खुद से करते गये !!
गिन-गिन कर के दिन निकले..
दिन-दिन कर कितने महिने गये !
कैसे जी सकता है कोई इस तरह..
यही सोच-सोच कर जीते गये !!
श्रद्धा अरविन्द विश्वा


