गुंज दो की थी
सुनते चार थे
घनी दुपहरिया मे मिलते आठ थे
आज दुपहरिया जरूर है
लेकिन सन्नाटे के साथ
कभी रात मे भी
गुंज होती थी
कुछ तो श़हर के भागे है
कुछ भगा दिये गये है
कुछ भुल गये है
कुछ भुलाना चाहते है
न जाने क्यूं
उन बचकानी यादों को मिटाना चाहते है
महसूसता हूं उस दुपहरिया को
दुपहरिया जरूर है
लेकिन सन्नाटे के साथ


