आख़िरी घंटा था साल का,
लम्हा लम्हा टपक रहा था
मासूम सी ख़ामोशियों का बादल,
उसकी यादें बनकर बरस रहा था
इक साल ही तो बीता है,
मैं तो तमाम उम्र उसको तरस रहा था
यूँ भी क्या ग़मज़दा होना,
इश्क़ तो अब भी वही है,
नया साल बस कैलेंडर बदल रहा था,
बस कैलेंडर बदल रहा था ।


