कुछ तो मेरा वक़्त वहीं है

कुछ मेरे अल्फ़ाज़ भी

रातों का कुछ चैन वहीं है

दिन की उलझन का सामान भी

शाम को जब दिल बैठ सा जाए

और कोई धुन आस जगाए

तुमसे मिलता हूँ मैं

उसी पुराने अपने घर में

दिन में भी और अंधेरी रात में

तुमसे मिलता हूँ मैं ।