उम्मीद मुझे है ये, कल एक नया सवेरा लेकर आयेगा, इन फैले अंधियारो में, सूरज प्रभात की किरणें लेकर आयेगा, कल जब मै जागूंगा, एक नयी प्रभा के दर्शन होंगे, मेरी पलकों के कोरो पर, फिर से सुंदर सपने होंगे, नयी नयी सी हरियाली से, हर कण कण शोभित होंगे, पौधों की हर एक डाली में, फूलों के यौवन होंगे, फिर लेकर टेक कहीं छाव की, बैठूंगा उसके नीचे. और निहारुंगा जी भर कर, बुलबुल को पत्तों के पीछॆ, पूरी ताकत से भर लूँगा उसको सांसो में, जब एक हवा का झोंका, मिट्‍टी की ख़ुशबू लेकर आयेगा, इन फैले अंधियारो में…! दौडूंगा फिर दूर तलक, खूब समंदर के तट पर, ठंडी ठंडी रेत चिपकती जायेगी, मेरे तलवों पर, गाता हुआ कही नावों पे, मांझी घर को जायेगा, दूर समंदर के छोरों पर, चाँद निकल कर आयेगा, छोटी छोटी लहरें आकर, मेरे पैरों से लिपटेंगी, शाम की मादक पुरवाई, मेरे चेहरे को चूमेंगी, अपने प्रियतम् की खातिर, गीत पपीहा फिर गायेगा, इन फैले अंधियारो में…! कल जब चाँद से बादल हट जायेगा, मेरा दामन फिर उम्मीदों से भर जायेगा, फिर दूर छितिज तक नज़र उठा कर देखूँगा, अपने अंतर्मन की गांठे फिर खोलूँगा, और लिखूँगा गीत नया तब, नयी चेतना जागेगी जब, जिसमें नव युग का अंकुर होगा, पूरा-पराभव से आगे, नया नया जीवन होगा, नयी नयी वाणी होगी, नया नया दर्शन होगा, नया नया होगा घर-आँगन, नया नया अंबर होगा, और खड़ा हो गिरि छितिज पर, गाऊँगा उस गीत को हर पल, मेरे विजय नाद को सुनकर, पर्वत भी थर्रायेगा, इन फैले अंधियारो में…!