इंसान ही इंसान को खा रहा है,

दोखाधड़ी और झूठ का परचम लहरा रहा है।

एक दूसरे का संहार कर के ,

न जाने क्या पा रहा है।


मिट्टी की ही तो मूरत हो तुम,

फिर घमंड किस बात करते हो तुम।

बहुत कर लिए दुष्कर्म तुमने,

अब उस कर्म का फल देखोगे तुम।


जान बचाने की चाह में,

इधर उधर भटक रहे हो तुम।

मरने के बाद भी धरती पर,

स्थान पाने को तरस रहे हो तुम।


थी भूख तुम्हे जिन पैसों की,

अब वो पैसा भी काम न आयेगा।

उड़ा दोगे लाखों रुपए भी तो,

जान न बचा पाओगे तुम।


इतना भयावह रूप देखकर भी,

जो कुछ न सीख पाए तुम।

दुनिया छोड़ चले जाओगे,

और कुछ न कर पाओगे तुम।



~ शिवानी