राह में जो कहर बन कर बैठे हैं,
वो ही मेरे हमसफ़र बन कर बैठे हैं,

ढूंढता फिरा हूँ जिस ख़ुदा को मैं,
वो मंदिर में पत्थर बन कर बैठे हैं,

कभी छाँव दिया था जिन शाख को मैंने,
वो बाग-ए-ग़ैर में शजर बन कर बैठे हैं,

जिसके होने से शामें सजा करती थी,
वो किसी और के सहर बन कर बैठे हैं।