हर किसी के कुछ अफ़साने हैं ,
यहां हर कोई हम'से दीवाने हैं,
शमा तो बुझ गयी कब कि,
मगर फिरते लाखों परवाने हैं,
अभी तो गुजर रहा था बसंत,
अब तो बस पतझड़ छाने हैं,
कुबूल हैं सब तोहफ़े शौक से,
अभी तो बहुत शिक़वे पाने हैं,
मिलते थे कई जब थे होश में,
बेहोशी में सिर्फ तुमको जाने हैं,
लो आ गए तुमसे दूर बिछड़,
यहां हम खुद से भी बेगाने हैं,
छोड़ो 'बयार' सारे वादे वफ़ा के,
अभी तो किस्से जफ़ा के आने हैं।
- शिव 'बयार'

