क्या देखती है तुम्हारी नज़रे एक लड़की में ?

देह, रंगत , कमनीयता या कुछ और भी ?

कोई खिलौना या कांच की गुडिया ?

जब कहो आप उठ जाये वो, जब चाहो फेंक दो आप

जो कहो आप कर जाये वो , जो चाहो सह जाये वो

नहीं, वो ऐसी नहीं है

वो जीना भी चाहती है ,

वो हँसना भी चाहती है

चाहती है वो उन्मुक्त गगन में पंख लगा कर उड़ना

चाहती है समंदर की गहराई में डूबना

कभी बारिश में भीगना, कभी छत पर पतंग उडाना

वो उसका जीवन है

बहने दो उसे अपनी दिशा में

क्यों रोकते हो उसे?

क्यों टोकते हो उसे ?

पैरो की पायल उसकी चाल कम करती है

हाथ के कंगन उसे अग्गे बढ़ने से रोकते है

गले का दुपट्टा उसे पीछे खीचता है

मत डालो उसे बेडियो में

मत डालो उस पर परम्पराओ का जाल

वो इन सबसे उपर है , उनमुक्त है

गौर से देखेगी अगर तुम्हारी आंखे उस लड़की मे

तो पायेगी , एक प्यारी से बेटी, माँ या नन्ही सी परी