टूटने से पहले अंगडायिया छोड़ बिछोना चल देती वो
सूरज की लाली आंगन में आये , पहले ही परदे खीच देती वो
अपनी पायल की छाप छोडती
झटपट घर को समेटती वो
भूल गई इन सबके बीच ख्वाब अपने संवारना
शीशे में फुर्सत से देखे अपने आप को हो गया जमाना
पगली है , कहती है घर की मालकिन हूँ मै
कोई पूछे उससे
कोई पूछे उससे
कब तुमने तसल्ली में पिछली बार खाना खाया था
कब तुमने मन पसंद की साड़ी पहनी थी
कब सजी थी तुम मन करके पिछली बार
पगली है , कहती है पिया की अर्धांग्नी हु मै
कोई पूछे उससे
कोई पूछे उससे
कब साथ वक़्त बिताया था
कब हसी खिलखिलाई थी
कब साथ बारिश में भीगी थी तुम पिछली बार
जागो अब इस घनघोर अँधेरे से स्त्री
अपना वजूद इसद तह खोने न दो
करो आजाद अपने आप को इस वहम से
तुम्हारे लिए ये आसमान पंख फैलाये खड़ा है
तोड़ो अपनी अंगडाईयां
उठा के पंख बस चल दो
बस चल दो


