जन से जन का सच्चे मन का अब वह प्यार कहाँ,
वैसी मिट्टी वैसा पानी अब वह सँसार कहाँ।
स्वार्थ सिद्धि के हेतु बने रिश्ते नाते जँजीरे,
मानस पट पर खीचीं हुई हैं कैसी वक्र लकीरें,
दे दिल को सच्ची शान्ति रहे अब वे उद्ग़ार कहां ।
वैसी मिट्टी...... सँसार कहाँ।
पूरब का है पवन कोई पश्चिम की गर्म हवा है,
तोपों के डर से डरीं डरी सी लगती मस्त सवा है,
रक्त की नदियां बहती हैं अब जीवन धार कहां।
वैसी मिट्टी.......संसार कहाँ।
समता के सूचक सूत्र यहां अब नये रुप मे आते,
बिकसित होने का अब वे एक नया रूप दिखलाते,
डूबती कश्ती कर सके पार अब वह पतवार कहां।
वैसी मिट्टी वैसा पानी अब वह संसार कहाँ ।।