Poetry 1 min read 786K reads

अखबार


खुश थे हम उनके हाथों का अख़बार बनकर ,हमें पढ़ते थे वो कभी जरूरी समाचार समझकर ,

मग़र भूल गए कि क़ीमत ज़्यादा मिलने पर हक़दार बदल जाया करते है ,हर सुबह उनकी हाथों के अख़बार बदल जाया करते है.....

— शिवांश #urstrulyShivu
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