तू पास वाली गली में ही रहा करती है,

फिर कैसी ये दूरी है, कैसी ये मजबूरी है,

हम सब अलग, ज़िन्दगी जीने के तरीके अलग,

फिर क्यों, किसी अपने जैसे कि ही तलब,

तेरी राह अलग , तेरी मंज़िल अलग,

सोच भी लू साथ सफर करना ,

तो भी मेरी सोच अलग, तेरी सोच अलग,

तेरी राह में लोग अलग , बस्ती अलग,

तेरी सही और गलत की किताब अलग,

तू लोगो के साथ रहना पसंद करती है,

मैं भीड़ में अक्सर शांति तलाशा करता हु,

तेरी शामें बड़ी रंगीन हुआ करती है,

मेरी शामों में हाथ मे केवल किताब हुआ करती है,

हम है तो इसी जगह,

पर तु कही में कही,

हम साथ भी आ जाए,

तो भी हम नहीं ।


शिवांश ताम्रकार