आज आसमान पर नजरे,
शायद सावन बरसे ,
साल दर साल इसकी उम्र घटे
लोक कल्पना में विचरे ,
शायद सावन बरसे |
प्रकृति के इस उत्सव में ,
हिमह्रदय नृत्य करते
जिस प्राकृतिक जेतना में हम पले,
उसे आज कई सवाल है घेरे
शायद सावन बरसे |
जिसे सजोया था कलम से ,
पन्त ,प्रसाद ,निराला जैसे
उस सावन को हमसे छीन लिया
प्रकृति का दोहन करते करते
शायद सावन बरसे |
झूले प्राण को तरसे
बूंदे साँस को तरसे
कृष्ण जन्म के समय जो दिखाई थी
कान्हा भी उस बरसात को तरसे |
शायद सावन बरसे |


