क्या हुआ जो , 

अंबर का पथ छोड़,रथ पर

सूर्य सरयू में घुलते जा रहे हैं।

क्या हुआ जो ,

बाँधाये घोर घिरी है,

पथ पर शूल मिलते जा रहे है।

क्या हुआ जो ,

निशा का पहर बहुत बड़ा है

प्रबल विरोधी बढ़ते जा रहे हैं।

क्या हुआ जो,

घृणा क्षणिक जीत रही है,

सत्य का शोणित निकलता जा रहा हैं,

अश्रु का आनंद अदभुत है,

इसका भी स्वाद लेते है,

बिन संघर्षों के मिले खुशियां,

हम उन्हें धिक्कार देते हैं।

क्या हुआ जो,

अंधकार है, रात हुई है,

आओ चांद से सितारें माँग लेते है,

चलो सपने उधार लेते है।