कविता - मैं शून्य पर सवार हूं
मैं शून्य पर सवार हूं । अनंत के उस पार हूं।।
मैं दर्द पर सवार हूं , मैं फर्ज़ पर सवार हूं।
मैं लुटा हर बार हूं , पर फ़िर से तैयार हूं ।।
हर सार का मैं सार हूं, हर ज़िस्म का मैं यार हूं ।
मैं रिश्तों में भटक रहा, उनकी आंखों में ही खटक रहा ,
मैं द्धंद का आधार हूं ।।
मैं शून्य पर सवार हूं । अनंत के उस पार हूं।।
तालुक सा मैं हार हूं , रूबरू मैं हर बार हूं।
हर अंधेरे के मैं पार हूं , मैं चिंगारी पे सवार हूं।।
मैं टूटा हर बार हूं , पर ख़ुद कहर हज़ार हूं ।
मैं खुली हुई किताब हूं, हर नशे का मैं खु़मार हूं।।
मैं शून्य पर सवार हूं । अनंत के उस पार हूं ।।
मैं खंजरों की धार हूं, सटीक हर बार हूं।
मैं प्राण घात वार हूं , पर तबस्सुम पर निसार हूं ।।
मैं हार का सबब बना , मैं जीत का इंतज़ार हूं ।
मेरी सोच लौह सी बनी,मैं अटूट सी दीवार हूं।।
मैं शून्य पर सवार हूं । अनंत के उस पार हूं।।
मैं बेख़बर इश्तेहार हूं , नकारा गया हर बार हूं ।
मैं कुछ ख़ास हर बार हूं, मैं पन्ने खुले हज़ार हूं ।।
मैं पर्वतों पर चढ़ रहा, मुश्किलों से लड़ रहा।
मैं हर पल बदल रहा, मैं प्रकृति का श्रृंगार हूं।।
मैं शून्य पर सवार हूं । अनंत के उस पार हूं।।
मैं ज़र्रा ज़र्रा बिखर गया, हर चोट पे सिहर गया ।
मैं मोम सा पिघल गया, यह मतलब नहीं मैं डर गया ।।
मैं तितलियों सा उड़ रहा, मैं कच्छुओं सा चल रहा।
कुंचियों में रंग भरे, सृष्टि को मैं रंग रहा।।
ज़हर में हूं घुल रहा, कंठ पर मैं चढ़ रहा।
मैं पल पल बदल रहा, मैं सूर्य का आधार हूं।।
मैं चन्द्र का आकार हूं, मैं चन्द्र का आकार हूं।।
मैं शून्य पर सवार हूं। अनंत के उस पार हूं।।


