वो मजदूर है साहब,
वो भूखा है।
ये हुजूम, जो
सड़कों पर उमड़ा है,
मीलों दूर से,
पैदल ही आ रहा है,
पैरों में छाले हैं,
उसने कई दर्द पाले हैं,
माथा पसीने से भीगा है,
किंतु होंठ सूखा है,
वो मजदूर है साहब,
वो भूखा है।
ये वो भीड़ है, जिसको
कोसना आसान है,
कोस भी लो,
वो कुछ बोलेंगे नहीं,
फोटो भी ले लो,
मजे भी ले लो,
पर उनके दर्द को,
समझो तो सही,
उनके लिए तो सरकार का,
रवैया भी रूखा है,
वो मजदूर है साहब,
वो भूखा है।
उसने कई घर बनाएं,
फैक्ट्रीयां भी बनाई है,
पर उनके लिए,
किसी भी घर से,
कोई रोशनी नहीं आई है,
उनमें होड़ लगी है,
मौत से, भूख से,
और उम्मीद से,
उनको पता भी नहीं,
मौत पहले आएगी,
अथवा घर,
लोगों से उनका,
उम्मीद बेरूखा है,
वो मजदूर है साहब,
वो भूखा है।
वो जो कभी,
भूख के लिए,
घर से निकला था,
आज फिर भूख के लिए,
घर को निकला है,
उसको पता ही नहीं,
क्या ग़लत है,
क्या सही है,
उसको अपने,
भूख से मतलब है,
और वो भूख के,
उम्मीद का भूखा है,
वो मजदूर है साहब,
वो भूखा है।
मज़ाक मत उड़ाओ उसका,
तुम्हारे लिए वो,
बस फोटो का किस्सा है,
वो मजदूर है,
वो हर निर्माण का हिस्सा है,
उसने तुम्हारे लिए,
छांव का निर्माण किया है,
ये सड़क, ये इमारत,
सब में उसने,
अपने पसीने का,
योगदान दिया है,
तुम आराम से,
सोये हो हर साम,
और उसका कन्धा,
हर शाम दूखा है,
वो मजदूर है साहब,
वो भूखा है।


