समझने वाले समझते हैं क्या?

दिल की बातें सुनते हैं क्या?


आपको लिखना छोड़ दिया है

अब मुझको पढ़ते हैं क्या?


किताबों पर धूल जमने से

किरदार भला बदलते हैं क्या?


अज़ाबों में झूलता रहता हूँ

इसे ज़िन्दगी कहते हैं क्या?


छूट जाते हैं जो रिश्ते पीछे

असल में वो छूटते हैं क्या?


मेरे ग़मो को नकारने वाले

मेरे बारे में जानते हैं क्या?


लीजिए उतार दिया नक़ाब

अब मुझे पहचानते हैं क्या?

-शिवानी सैनी